Thursday, June 24, 2010


दोस्तों

कभी कभी दिल गहरी उदासी में डूबता उतराता भविष्य पर पड़ी गहरी धुंध में कुछ तलाशता है और अपनी तलाश में नाकाम होने पर खीज उठता है, हताश हो जाता है, रो पड़ता है, लेकिन हताशा के उन पलों में आंसुओं और आहों के बीच अगर दिल की चीखें शब्दों का जामा पहन लें तो रात की तन्हाई में कोरे कागज़ पर रचना के जन्म को रोका नहीं जा सकता। कम से कम मैं तो नहीं रोक पाती। तो आइये ऐसी ही परिस्थितियों में जन्मी अपनी एक रचना से आपको मिलवाती हूँ।


रस्ता नहीं, ना सामने कोई मुकाम हो

मौत आये के अब उम्र का किस्सा तमाम हो

आहट कोई आये तो दिल कांपता है यूँ

क्या जानिये के फिर किसी ग़म का पयाम हो

किस काम की दौलत भला किस काम का वो घर

जिसमे सुकून-ओ-चैन से जीना हराम हो

कोई बताये किस तरह वो नामे-खुदा ले

जिसकी हरेक सांस में दिलबर का नाम हो

ऐ दिल चल एक बार फिर उसकी गली चलें

शायद मेरे नसीब में उसका सलाम हो

2 comments:

  1. बहुत अच्छी रचना

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  2. कोई बताये किस तरह वो नामे-खुदा ले
    जिसकी हरेक सांस में दिलबर का नाम हो अच्छी रचना !!!

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